एक धनी साहूकार अपनी पत्नी को विदा कराने ससुराल गया। कुछ दिन रहकर उसने सास-ससुर से कहा — अब हमें विदा कीजिए। घर पर बहुत काम है।
सास-ससुर और घर के लोगों ने समझाया — आज बुधवार है। बुध के दिन न यात्रा शुरू करते हैं, न बेटी को विदा करते हैं। कल चले जाना। पर साहूकार को शुभ-अशुभ की बातें बेकार लगती थीं। वह बोला — मुझे इन बातों में कुछ नहीं रखा; आज ही चलेंगे। और वह उसी दिन पत्नी को रथ में बैठाकर चल पड़ा।
राह में पत्नी को बड़े ज़ोर की प्यास लगी। साहूकार लोटा लेकर रथ से उतरा और पानी लेने चला गया।
पानी लेकर लौटा तो उसके पैर वहीं जम गए — रथ में उसकी पत्नी के पास ठीक उसी की शक्ल-सूरत, वही वेशभूषा, वही चाल-ढाल का एक आदमी बैठा था। पत्नी भी दोनों को देखकर हक्की-बक्की रह गई — कौन असली है, वह भी नहीं कह पा रही थी।
साहूकार ने गरजकर पूछा — तू कौन है, जो मेरी पत्नी के पास बैठा है? दूसरा उतने ही अधिकार से बोला — यह मेरी पत्नी है; मैं अभी इसे ससुराल से विदा कराकर ला रहा हूँ। तू कौन है? दोनों में झगड़ा बढ़ गया, और तमाशा देखने वालों की भीड़ जुट गई।
राज्य के सिपाही आ पहुँचे — और पकड़ा किसे? लोटा हाथ में लिए असली साहूकार को। पत्नी से पूछा गया — तुम्हारा असली पति कौन है? वह चुप रह गई — बोलती भी क्या, दोनों एक-से जो थे। कुछ कथाओं में यह मामला राजा तक भी पहुँचता है, और राजा भी निर्णय नहीं कर पाता।
घबराए साहूकार ने आकाश की ओर देखकर पुकारा — हे परमेश्वर! यह क्या लीला है कि सच्चा झूठा बन रहा है! तभी आकाशवाणी हुई — मूर्ख, आज बुधवार के दिन तुझे यात्रा नहीं करनी थी। तूने किसी की बात नहीं मानी। यह सब भगवान बुध देव की लीला है।
साहूकार ने बुध देव से क्षमा माँगी और प्रण किया — अब कभी बुधवार को यात्रा शुरू नहीं करूँगा, और बुधवार का व्रत नियम से रखूँगा। इतना कहते ही दूसरा आदमी — जो स्वयं बुध देव थे — अंतर्धान हो गया।
साहूकार पत्नी के साथ सकुशल घर पहुँचा। उस दिन से दोनों नियमपूर्वक बुधवार का व्रत रखने लगे, और उनके घर में सुख-समृद्धि बनी रही।
कथा कहती है — जो बुधवार का व्रत रखे और यह कथा कहे-सुने, उसे बुधवार की यात्रा का दोष नहीं लगता और बुध देव की कृपा से उसके काम सुधरते हैं। बोलो बुध देव की जय!
