भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा था। वह हर गुरुवार का व्रत रखता, बृहस्पति देव का पूजन करता, और ब्राह्मणों-गरीबों की सहायता करता। पर रानी को यह सब फूटी आँख नहीं सुहाता था — न वह व्रत रखती, न एक पैसा दान करती, और राजा को भी दान-पुण्य से रोकती।
एक दिन राजा शिकार पर गया था। बृहस्पति देव साधु का वेश धरकर द्वार पर भिक्षा माँगने आए। रानी बोली — महाराज, मैं इस दान-पुण्य से तंग आ गई हूँ। कोई ऐसा उपाय बताइए कि यह सारा धन नष्ट हो जाए और मैं चैन से रहूँ।
साधु ने पहले तो शुभ राह सुझाई — भूखों को भोजन कराओ, प्याऊ लगवाओ, कुएँ-तालाब-बावड़ियाँ बनवाओ, मंदिर और पाठशालाएँ खड़ी कराओ, गरीब कन्याओं का विवाह कराओ — धन शुभ में लगे तो जन्म सुधर जाए। पर रानी को यह मंज़ूर नहीं था। उसे तो धन का नाश चाहिए था।
तब साधु ने कहा — अच्छा, ऐसा कर: गुरुवार के दिन घर गोबर से लीपना, पीली मिट्टी से सिर धोकर स्नान करना, राजा से हजामत बनवाना, भोजन में मांस-मदिरा लेना, और कपड़े धोबी के यहाँ भेज देना। सात गुरुवार ऐसा करेगी तो सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर साधु अंतर्धान हो गए।
रानी ने वैसा ही किया — और सात की नौबत ही नहीं आई; तीसरे गुरुवार तक कौड़ी-कौड़ी चली गई। घर में खाने के लाले पड़ गए। राजा ने कहा — यहाँ मुझे सब जानते हैं; मैं यहाँ छोटा काम नहीं कर सकता। और वह परदेस चला गया — वहाँ जंगल से लकड़ियाँ काटकर नगर में बेचता और गुज़ारा करता।
इधर रानी और दासी सात दिन भूखी रहीं। रानी ने दासी को अपनी बड़ी बहन के पास भेजा — पड़ोस के नगर में ब्याही धनवान बहन के पास। दासी पहुँची तो बहन बृहस्पतिवार की कथा सुन रही थी — और कथा के बीच न उठा जाता है, न बोला जाता है। दासी को कोई उत्तर नहीं मिला; वह झल्लाकर लौट आई। रानी ने अपने कर्मों को दोष दिया।
पूजा पूरी करके बहन दौड़ी आई और बोली — बहन, गुरुवार की कथा चल रही थी, इसलिए उत्तर नहीं दे सकी। बृहस्पति देव सबकी मनोकामना पूरी करते हैं — जाकर घर के बर्तन देखो। दासी ने जिन बर्तनों को खाली छोड़ा था, उनमें एक घड़ा अनाज से भरा मिला।
बहन ने विधि बताई — केले की जड़ में विष्णु और बृहस्पति देव का पूजन करो, चने की दाल और मुनक्का चढ़ाओ, दीपक जलाओ, कथा सुनो, और दिन में एक बार पीला भोजन करो। अगले गुरुवार रानी और दासी ने घुड़साल से चना-गुड़ बीनकर पूजा की। पीला भोजन कहाँ से आता? — तभी एक साधारण मनुष्य के रूप में बृहस्पति देव स्वयं दो थालियों में पीला भोजन दे गए।
व्रत चलता रहा और धन लौट आया। रानी फिर आलस में पड़ने लगी, तो दासी ने टोका — यह धन शुभ कामों में लगाओ। अबकी रानी ने बात मानी — प्याऊ लगवाए, कुएँ-तालाब खुदवाए, धर्मशालाएँ और मंदिर बनवाए, गरीब कन्याओं के विवाह कराए। उसका यश फैलने लगा।
उधर परदेस में एक गुरुवार राजा पेड़ के नीचे बैठा रो रहा था। वही साधु फिर आए और बोले — तेरी रानी ने बृहस्पति देव का निरादर किया था; अब उसने व्रत फिर से शुरू कर दिया है। तू भी कर — केले की जड़ में चने की दाल, गुड़ और लोटे के जल से पूजन कर, और कथा कह या सुन। राजा बोला — पैसे नहीं हैं, और कथा भी नहीं आती। साधु ने कहा — गुरुवार को तेरी लकड़ियाँ दुगने दाम बिकेंगी; और कथा यह ले —
एक गरीब ब्राह्मण था। उसकी स्त्री फूहड़ थी — न नहाती, न पूजा करती। पर बेटी धर्मपरायण थी: गुरुवार का व्रत रखती। पाठशाला जाते हुए वह राह में जौ बिखेरती जाती — और लौटते में वही जौ सोने के हो जाते। एक दिन बोली — सोने के जौ के लिए सोने का सूप चाहिए। अगले गुरुवार के व्रत से सोने का सूप मिल गया। सूप में सोने के जौ फटकते उसे राजकुमार ने देखा और ब्याह कर ले गया। बेटी के जाते ही ब्राह्मण के घर फिर दरिद्रता आ गई — बेटी ने बुलाकर माँ को ज़बरदस्ती नहलवाया और पूजा में बैठाया; माँ सुधर गई, और घर फिर भर गया।
गुरुवार को राजा की लकड़ियाँ सचमुच दुगने दाम बिकीं, और वह व्रत करने लगा। पर अगले ही गुरुवार वह कथा करना भूल गया — और बृहस्पति देव अप्रसन्न हो गए।
उसी दिन उस नगर के राजा ने ढिंढोरा पिटवाया — आज किसी घर में चूल्हा न जले; सब महल में भोजन करें। राजा (लकड़हारा) देर से पहुँचा तो उसे महल के भीतर बैठाकर भोजन कराया गया। वहीं खूँटी पर रानी का हार टँगा था — रानी को हार दिखा नहीं, तो चोरी का इल्ज़ाम इसी परदेसी पर लगा। वह जेल में डाल दिया गया।
जेल में उसे साधु की बात याद आई। बृहस्पति देव प्रकट हुए — तूने कथा छोड़ दी थी। देख, गुरुवार को जेल के द्वार पर चार पैसे मिलेंगे — उनसे पूजा कर। वैसा ही हुआ; उसने पूजन करके प्रसाद बाँटा। उसी रात उस नगर के राजा को स्वप्न आया — यह आदमी निर्दोष है; हार खूँटी पर टँगा है; इसे छोड़ दे। सुबह हार खूँटी पर मिला। राजा ने क्षमा माँगी, वस्त्र-आभूषण देकर सम्मान से विदा किया।
अपने नगर के पास पहुँचा तो राजा ठिठक गया — नए बाग़, तालाब, कुएँ, धर्मशालाएँ, मंदिर। पूछा — यह सब किसने बनवाया? लोगों ने कहा — रानी और दासी ने। घर पहुँचकर उसने क्रोध में पूछा — यह धन कहाँ से आया? तब रानी ने पूरी कथा कह सुनाई। राजा ने नियम लिया — अब हर दिन बृहस्पति की कथा कहूँगा; चने की दाल दुपट्टे में बाँधे रहूँगा, और दिन में तीन बार कथा कहूँगा।
एक दिन वह घोड़े पर बहन के नगर चला। राह में एक शवयात्रा मिली — उसने कहा, ज़रा रुककर यह कथा सुन लो। कथा आधी हुई कि शव में हलचल हुई; पूरी हुई तो मृतक राम-राम कहता उठ बैठा। आगे एक किसान हल जोत रहा था — उसने कथा सुनने से मना कर दिया; उसके बैल गिर पड़े और पेट में दर्द उठा। किसान की बूढ़ी माँ दौड़कर राजा को खेत में लौटा लाई — कथा हुई, बैल उठ खड़े हुए, पीड़ा गई।
बहन के नगर में सबने कहा — हमारे यहाँ पहले भोजन होता है, कथा कौन सुने? केवल एक कुम्हार के घर, जहाँ बेटा बीमार था और तीन दिन से किसी ने खाया नहीं था, कथा सुनी गई — और उस घर का संकट कट गया।
बहन की सास ने अपने पोतों को मौसा के साथ भेजने से मना कर दिया — निःसंतान के साथ बच्चे नहीं भेजते। राजा दुखी होकर लौटा। रानी ने कहा — बृहस्पति देव पर भरोसा रखो। स्वप्न में आकाशवाणी हुई — तेरी रानी गर्भ से है। नवें महीने बेटा हुआ। बधाई लेकर आई बहन को रानी ने ताना दिया, तो बहन हँसकर बोली — ऐसा न कहती, तो तुम्हें बेटा कहाँ से मिलता?
कथा कहती है — जो गुरुवार का व्रत रखे और यह कथा पढ़े, सुने या सुनाए, बृहस्पति देव उसकी हर मनोकामना पूरी करते हैं और सदा रक्षा करते हैं। अनजाने में भी उनका निरादर न हो, और कथा के बाद प्रसाद अवश्य लिया जाए। बोलो बृहस्पति देव की जय!
