युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा — भगवन्, ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? श्रीकृष्ण बोले — यह अपरा एकादशी है; इसे अचला भी कहते हैं। यह अपार धन देने वाली है, और पापरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी के समान है। इसकी कथा सुनो।
महीध्वज नाम का एक धर्मात्मा राजा था — न्यायप्रिय, प्रजा का प्यारा। पर उसका छोटा भाई वज्रध्वज क्रूर और अधर्मी था, और बड़े भाई से ईर्ष्या रखता था।
एक रात वज्रध्वज ने अवसर पाकर राजा का वध कर दिया और शव को जंगल में एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु के कारण राजा प्रेत बनकर उसी पीपल पर रहने लगा, और आते-जाते लोगों को त्रास देने लगा।
एक दिन धौम्य ऋषि उधर से निकले। प्रेत को देखते ही उन्होंने तपोबल से उसका सारा वृत्तांत जान लिया — यह तो धर्मात्मा राजा महीध्वज है। ऋषि ने उसे पीपल से उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया।
फिर ऋषि ने वह किया जो इस कथा का प्राण है — राजा को इस अगति से छुड़ाने के लिए उन्होंने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत किया, और उसका सारा पुण्य संकल्प करके प्रेत को अर्पण कर दिया।
पुण्य मिलते ही राजा उसी क्षण प्रेत योनि से छूट गया। दिव्य देह पाकर उसने ऋषि को धन्यवाद दिया, और पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया।
श्रीकृष्ण बोले — हे राजन्! यह अपरा एकादशी की कथा मैंने लोकहित के लिए कही है। कथा कहती है — इसके पढ़ने-सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है, और इस व्रत का फल बड़े तीर्थों के स्नान-दान के बराबर है। बोलो भगवान विष्णु की जय!
