अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा — मधुसूदन, चैत्र कृष्ण एकादशी का क्या नाम है और उसका माहात्म्य क्या है? श्रीकृष्ण बोले — इसका नाम पापमोचनी है — पापों से मुक्त करने वाली। यही कथा लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को सुनाई थी; वही मैं तुमसे कहता हूँ।
चैत्ररथ नाम का एक सुंदर वन था, जहाँ सदा वसंत रहता — अप्सराएँ, किन्नर और गंधर्व वहाँ विहार करते, और देवराज इंद्र देवताओं के साथ क्रीड़ा करते। उसी वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि कठोर तपस्या में लीन थे।
कामदेव ने उनका तप भंग करने की ठानी और मंजुघोषा अप्सरा को भेजा। वह थोड़ी दूर बैठकर वीणा पर मीठे स्वर में गाने लगी। गीत और रूप में बंधे मेधावी अपना तप भूल गए — और दोनों साथ रहने लगे।
इस तरह सत्तावन वर्ष बीत गए — एक रात की तरह। एक दिन मंजुघोषा ने जाने की आज्ञा माँगी। ऋषि बोले — संध्या को तो आई हो, प्रातःकाल होने पर चली जाना। वह बोली — हे ऋषिवर! आपकी रात तो बहुत लंबी है — आप ही सोचिए, मुझे आए कितना समय हो गया।
ऋषि चौंके — गिनती की तो सत्तावन वर्ष निकल गए थे। इतने वर्षों का तप गया — क्रोध में उन्होंने शाप दिया: मेरे तप को नष्ट करने वाली! जा, तू पिशाचिनी बन जा। मंजुघोषा काँपती हुई हाथ जोड़कर बोली — ऋषिवर, साधु के संग का फल तो शुभ होना चाहिए; मुझ पर कृपा करके इस शाप से छूटने का उपाय बताइए।
मेधावी ने कहा — चैत्र कृष्ण की पापमोचनी एकादशी का व्रत कर; उसी से यह देह छूटेगी। फिर वे स्वयं अपने पिता च्यवन ऋषि के पास पहुँचे। पिता ने देखते ही कहा — पुत्र, तेरा सारा तेज मलिन हो गया है। उन्होंने कड़ी फटकार लगाई और कहा — तू भी वही पापमोचनी एकादशी का व्रत कर।
दोनों ने विधि से व्रत किया। मंजुघोषा पिशाच-देह से छूटकर अपना सुंदर रूप पाकर देवलोक चली गई, और मेधावी का तप-तेज लौट आया।
कथा कहती है — पापमोचनी एकादशी के व्रत से बड़े-से-बड़े पाप कट जाते हैं, और इस कथा के पढ़ने-सुनने का फल हज़ार गौ-दान के बराबर है। परंपरा इस कथा को भविष्योत्तर पुराण के नाम से कहती है। बोलो भगवान विष्णु की जय!
