युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा — भगवन्, वैशाख कृष्ण एकादशी का क्या नाम है और उसका फल क्या है? श्रीकृष्ण बोले — इसका नाम वरूथिनी एकादशी है। यह सौभाग्य देने वाली, सब पापों को नष्ट करने वाली और अंत में मोक्ष देने वाली है। इसी का व्रत राजा मान्धाता ने किया था — सुनो।
नर्मदा नदी के तट पर राजा मान्धाता राज करते थे — दानशील और तपस्वी। एक दिन वे वन में आसन लगाकर तपस्या में बैठे थे।
तभी न जाने कहाँ से एक जंगली भालू आया और राजा का पैर चबाने लगा। राजा तपस्या में लीन रहे। भालू उन्हें घसीटकर वन में गहरे ले चला। राजा डरे, पर तपस्वी के धर्म में बंधे रहे — न क्रोध किया, न हिंसा; बस करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारते रहे।
भगवान प्रकट हुए और सुदर्शन चक्र से भालू का वध कर दिया। पर राजा का पैर तो भालू खा चुका था — राजा शोक में डूब गए।
भगवान बोले — हे वत्स! शोक मत करो। इस भालू ने तुम्हें जो काटा है, वह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था। तुम मथुरा जाओ और वरूथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरी वराह अवतार मूर्ति की पूजा करो — उसके प्रभाव से तुम फिर से सम्पूर्ण अंगों वाले हो जाओगे।
राजा ने वैसा ही किया — मथुरा जाकर वरूथिनी का व्रत रखा और वराह भगवान की पूजा की। व्रत के प्रभाव से वे फिर से सम्पूर्ण अंगों वाले और पहले जैसे तेजस्वी हो गए, और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुए।
कथा कहती है — वरूथिनी एकादशी का व्रत दस हज़ार वर्ष की तपस्या के बराबर फल देता है, और इस कथा के पढ़ने-सुनने का पुण्य हज़ार गौ-दान के समान है। बोलो भगवान विष्णु की जय!
