युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा — भगवन्, वैशाख शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? श्रीकृष्ण बोले — इसका नाम मोहिनी एकादशी है। यही कथा एक बार वशिष्ठ मुनि ने श्रीराम को सुनाई थी; वही मैं तुमसे कहता हूँ।
श्रीराम ने वशिष्ठ जी से कहा था — गुरुदेव, मैंने सीताजी के वियोग में बहुत दुख भोगे हैं। कोई ऐसा व्रत बताइए जो सब पाप और दुख हर ले। वशिष्ठ जी बोले — हे राम, आपके नाम के स्मरण मात्र से मनुष्य पवित्र हो जाता है; फिर भी लोकहित में कहता हूँ — वैशाख शुक्ल की मोहिनी एकादशी मोहजाल से छुड़ाने वाली और पापों को नष्ट करने वाली है। इसकी कथा सुनिए।
सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की नगरी थी, जहाँ चंद्रवंशी राजा द्युतिमान राज करते थे। वहीं धनपाल नाम का वैश्य रहता था — धनी भी, धर्मात्मा भी: प्याऊ, कुएँ, तालाब और धर्मशालाएँ बनवाता, राहों पर आम, जामुन और नीम के पेड़ लगवाता।
उसके पाँच बेटे थे — सुमना, सद्बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबुद्धि। सबसे छोटा धृष्टबुद्धि महापापी निकला — जुआ, मद्य-मांस और दुराचारी संगति में डूबा, देवता-पितर-बड़ों का अपमान करता, पिता का धन उड़ाता। हारकर धनपाल ने उसे घर से निकाल दिया।
गहने और वस्त्र बेचकर जब तक पैसा रहा, संगी-साथी साथ रहे; धन गया तो सब छोड़ गए। भूख से व्याकुल होकर वह चोरी करने लगा। पहली बार धनपाल का बेटा जानकर चेतावनी देकर छोड़ दिया गया; दूसरी बार पकड़ा गया तो राजा के सामने पेश हुआ — कारागार, दंड, और अंत में नगर से निकाला।
वन में वह शिकार करके पेट पालने लगा — धनुष-बाण लेकर जीवों को मारता, खाता और बेचता। इसी तरह भटकते-भटकते वैशाख का महीना आया, और भूखा-प्यासा वह कौण्डिन्य ऋषि के आश्रम की ओर जा निकला।
ऋषि गंगा-स्नान करके लौट रहे थे। उनके भीगे वस्त्रों के छींटे भर उस पापी पर पड़े — और इतने से ही उसमें सद्बुद्धि जागी। उसने हाथ जोड़कर कहा — ऋषिवर, मैंने जीवन में बहुत पाप किए हैं। कोई साधारण, बिना धन का उपाय बताइए, जिससे इनसे छूट सकूँ।
कौण्डिन्य बोले — वैशाख शुक्ल की मोहिनी एकादशी का व्रत कर। इसके प्रभाव से अनेक जन्मों के मेरु पर्वत जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। धृष्टबुद्धि ने बताई हुई विधि से व्रत किया — सब पाप जलकर भस्म हुए, उसे दिव्य देह मिली, और वह गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक गया।
कथा कहती है — तीनों लोकों में मोहिनी एकादशी से बड़ा कोई व्रत नहीं; यह मोहजाल और पापों से छुड़ाने वाली है, और इसके माहात्म्य के पढ़ने-सुनने का पुण्य हज़ार गौ-दान के समान है। बोलो भगवान विष्णु की जय!
