युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा — भगवन्, मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का क्या नाम है, और उसका व्रत कैसे होता है? श्रीकृष्ण बोले — इसका नाम मोक्षदा एकादशी है; यह बड़े-बड़े पापों को नष्ट करती है और चिंतामणि की तरह सब कामनाएँ पूरी करती है। इस दिन भगवान दामोदर का धूप, दीप और नैवेद्य से पूजन होता है। इसकी कथा सुनो।
चम्पक नगर में वैखानस नाम का राजा राज करता था। उसके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे, और राजा प्रजा को अपनी संतान की तरह पालता था।
एक रात राजा ने स्वप्न देखा — उसके पिता नरक में यातनाएँ भोग रहे हैं। पिता ने हाथ जोड़कर कहा — हे पुत्र! मैं नरक में पड़ा हूँ; मुझे यहाँ से मुक्त कराओ।
सुबह राजा का मन कहीं नहीं लगा — राज्य, धन, परिवार, कुछ भी सुख नहीं दे रहा था; शरीर जल रहा था। उसने विद्वान ब्राह्मणों के आगे स्वप्न रखा और कहा — जिस पुत्र से माता-पिता का उद्धार न हो, उसका जीवन किस काम का? एक सुपुत्र हज़ार मूर्खों से भला है — जैसे हज़ार तारों से एक चन्द्रमा।
ब्राह्मणों ने कहा — पास ही पर्वत मुनि का आश्रम है; वे भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों के ज्ञाता हैं। राजा आश्रम पहुँचा और साष्टांग प्रणाम किया। मुनि ने आँखें मूँदकर योगबल से पीछे का सब देखा और बोले — राजन्, तुम्हारे पिता ने पिछले जन्म में अपनी ही एक पत्नी के साथ बड़ा अन्याय किया था; उसी दोष से वे नरक में हैं।
राजा ने पूछा — उपाय? मुनि बोले — मार्गशीर्ष शुक्ल की मोक्षदा एकादशी का व्रत करो, और उसका पुण्य संकल्प करके अपने पिता को दे दो। इसके प्रभाव से वे अवश्य मुक्त होंगे।
राजा ने पूरे परिवार के साथ विधि से व्रत किया और उसका पुण्य पिता को अर्पण कर दिया। उसी क्षण पिता नरक से छूटे और स्वर्ग की ओर जाते हुए आकाश से आशीर्वाद दिया — हे पुत्र! तेरा कल्याण हो।
कथा कहती है — मोक्षदा एकादशी का व्रत करने वाले के पाप नष्ट होते हैं; मोक्ष देने वाला इससे बड़ा कोई व्रत नहीं, और इस कथा के पढ़ने-सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। परंपरा इस कथा को ब्रह्माण्ड पुराण के नाम से कहती है। बोलो भगवान विष्णु की जय!
