॥ प्रथम अध्याय ॥नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि ऋषियों ने सूतजी से पूछा — इस कलियुग में, जिनके पास वेद-विद्या नहीं, उनका उद्धार कैसे हो? कोई ऐसा व्रत बताइए जिसमें परिश्रम थोड़ा हो और फल बड़ा। सूतजी बोले — यही प्रश्न एक बार नारदजी ने भगवान नारायण से पूछा था।
नारदजी मृत्युलोक में घूमते हुए प्राणियों को अपने-अपने कर्मों का दुख भोगते देखकर विष्णुलोक पहुँचे। शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए, वनमाला पहने चतुर्भुज नारायण की स्तुति करके उन्होंने पूछा — प्रभु, ऐसा कौन-सा छोटा-सा उपाय है जिससे यह सारा दुख कटे? भगवान बोले — नारद, वह श्रीसत्यनारायण का व्रत है — स्वर्ग में भी दुर्लभ; इस लोक में भोग और अंत में मोक्ष देने वाला।
व्रत की विधि भी भगवान ने वहीं बताई — किसी भी दिन हो सकता है; संध्या के समय, ब्राह्मणों और कुटुम्बियों के साथ। केले, घी, दूध, गेहूँ का आटा और शक्कर या गुड़ — सब सवा-सवा माप में, भक्ति-भाव से नैवेद्य अर्पित हो। पहले ब्राह्मणों और अपने लोगों को भोजन कराया जाए, फिर स्वयं प्रसाद लिया जाए, और रात कीर्तन-स्मरण में बीते। जो ऐसा करता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है — कलियुग में इससे छोटा रास्ता कोई नहीं।
॥ द्वितीय अध्याय ॥काशीपुर में एक दरिद्र ब्राह्मण भूख से व्याकुल होकर भटकता था। भगवान वृद्ध ब्राह्मण का रूप धरकर उसके पास आए, उसका दुख पूछा और सत्यनारायण का व्रत बताकर अंतर्धान हो गए। संकल्प लिए ब्राह्मण को रात भर नींद नहीं आई। अगले दिन भिक्षा में अनायास इतना मिला कि उसने व्रत की सामग्री जुटाई और कुटुम्ब सहित व्रत किया। उसकी दरिद्रता कट गई; वह हर महीने व्रत करता रहा और अंत में मोक्ष पाया।
एक दिन एक बूढ़ा लकड़हारा सिर का बोझ बाहर रखकर पानी पीने ब्राह्मण के घर आया। व्रत होते देखा तो पूछा — यह क्या है, और इसका फल क्या? ब्राह्मण ने सब बताया। लकड़हारे ने चरणामृत और प्रसाद लिया, और घर जाते हुए संकल्प किया — आज की लकड़ियों का जो दाम मिलेगा, उसी से यह व्रत करूँगा। उस दिन अमीरों के मोहल्ले में उसकी लकड़ियों का चौगुना दाम मिला। उसने पके केले, शक्कर, घी, दूध, दही और आटा लेकर कुटुम्ब सहित व्रत किया — धन-पुत्र से भरा-पूरा हुआ और अंत में वैकुण्ठ पाया।
॥ तृतीय अध्याय ॥राजा उल्कामुख सत्यवादी और जितेन्द्रिय थे। भद्रशिला नदी के तट पर वे अपनी रानी के साथ सत्यनारायण का व्रत कर रहे थे। तभी साधु नाम का एक वैश्य व्यापारी अपनी नाव वहाँ ले आया और पूछकर बोला — मेरे संतान नहीं है; संतान हुई तो मैं भी यह व्रत करूँगा। भगवान की कृपा से उसकी पत्नी लीलावती की गोद में कन्या आई — कलावती, जो शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की तरह बढ़ने लगी। लीलावती ने संकल्प याद दिलाया, तो साधु बोला — कन्या के विवाह पर करूँगा। कांचन नगर के योग्य वणिक-पुत्र से विवाह भी हो गया — और संकल्प फिर भूल गया। भगवान रुष्ट हुए।
साधु अपने दामाद के साथ व्यापार के लिए समुद्र किनारे रत्नसारपुर पहुँचा, जहाँ राजा चन्द्रकेतु का राज था। उन्हीं दिनों एक चोर राजा का धन चुराकर भागा और पीछा होते देख वह धन वहीं डालकर भाग गया जहाँ दोनों व्यापारी ठहरे थे। पहरेदारों ने धन के साथ दोनों को पकड़ लिया; राजा ने बिना सुनवाई दोनों को कारागार में डाला और उनका धन भी छीन लिया। उधर घर पर भी चोरों ने लीलावती और कलावती को कंगाल कर दिया। भूखी कलावती एक दिन एक ब्राह्मण के घर पहुँची — वहाँ सत्यनारायण का व्रत हो रहा था। उसने कथा सुनी, प्रसाद लिया और देर से घर लौटी। कारण सुनकर लीलावती ने कुटुम्ब सहित व्रत किया और विनती की — जो भूल हुई हो क्षमा हो; पति और दामाद घर लौटें। भगवान प्रसन्न हुए और राजा चन्द्रकेतु को स्वप्न में कहा — दोनों निर्दोष हैं; भोर में छोड़ दो और धन लौटा दो, नहीं तो राज्य, धन और पुत्र नष्ट कर दूँगा। राजा ने दोनों को छोड़ा, दुगुना धन देकर सम्मान से विदा किया।
॥ चतुर्थ अध्याय ॥घर की राह में भगवान ने साधु की परीक्षा ली। दण्डी संन्यासी का रूप धरकर पूछा — बेटा, तेरी नाव में क्या भरा है? धन के मद में डूबा वणिक हँसा — क्यों महाराज, कुछ ले लेने की सोची है? नाव में तो लता-पत्ते भरे हैं। दण्डी बोले — तथास्तु। और नाव पानी में ऊँची उठ आई — भीतर सचमुच लता-पत्ते ही थे। साधु मूर्छित हो गिरा। दामाद ने कहा — उन्हीं दण्डी की शरण चलिए। साधु ने असत्य-भाषण की क्षमा माँगी। भगवान बोले — तूने बार-बार मेरी पूजा से मुँह मोड़ा है। साधु गिड़गिड़ाया — प्रभु, आपकी माया ब्रह्मा भी नहीं जानते; अब अपनी सामर्थ्य भर आपकी पूजा करूँगा — मेरी नाव लौटा दीजिए। नाव फिर धन से भर गई; साधु ने वहीं पूजा की और घर की ओर चला, आगे संदेश भेजकर।
संदेश पहुँचा तो लीलावती और कलावती पूजा में बैठी थीं। माँ ने पूजा पूरी करके घाट की राह ली और बेटी से कहा — पूजा पूरी करके आना। पर पति के लौटने की उतावली में कलावती प्रसाद छोड़कर ही दौड़ पड़ी — और भगवान ने उसके पति को नाव समेत डुबो दिया। साधु ने हाथ जोड़े; आकाशवाणी हुई — तेरी बेटी मेरा प्रसाद छोड़ आई है। वह घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके लौटे, तो पति मिलेगा। कलावती ने वैसा ही किया — और उसका पति नाव सहित लौट आया। वहीं सबने व्रत किया, और साधु जीवन भर हर पूर्णिमा और संक्रान्ति को सत्यनारायण का व्रत करता रहा; अंत में मोक्ष पाया।
॥ पंचम अध्याय ॥राजा तुंगध्वज प्रजा का पालन करने वाले धर्मी राजा थे। शिकार से लौटते हुए वे एक बरगद के नीचे विश्राम को रुके। वहाँ गोप-ग्वाले अपने कुटुम्ब सहित सत्यनारायण की पूजा कर रहे थे। पद के अभिमान में राजा न पास गए, न प्रणाम किया। ग्वालों ने आदर से प्रसाद उनके आगे रखा — राजा उसे छोड़कर चले गए। नगर पहुँचे तो देखा — राज्य और धन सब तहस-नहस। समझ गए कि यह किसका हाथ है। लौटकर उसी बरगद के नीचे ग्वालों के साथ भक्ति से पूजा की और प्रसाद ग्रहण किया — सब कुछ लौट आया। वे सुख से जीकर अंत में देवलोक गए।
कथा कहती है — जो यह व्रत करे और कथा सुने, उसका दरिद्र कटे, बंधन छूटे, भय मिटे, और निःसंतान को संतान मिले; मन की इच्छा पूरी हो और अंत में सद्गति मिले।
आगे चलकर यही पात्र फिर जन्मे — काशीपुर के ब्राह्मण शतानन्द सुदामा हुए और कृष्ण-भक्ति से मोक्ष पाया; लकड़हारा निषादराज गुह हुआ, जिसने राम की सेवा की; राजा उल्कामुख दशरथ हुए; साधु वणिक राजा मोरध्वज हुआ, जिसने विष्णु के लिए अपने पुत्र तक को अर्पित कर दिया; और राजा तुंगध्वज स्वायम्भुव मनु हुए। बोलो श्रीसत्यनारायण भगवान की जय!
