एक बार स्वर्गलोक में नवग्रहों में झगड़ा छिड़ गया — सबसे बड़ा कौन? बात बढ़ते-बढ़ते युद्ध तक पहुँचने लगी। देवता इन्द्र के पास गए, तो इन्द्र ने हाथ जोड़ दिए — यह न्याय मुझसे नहीं होगा। पृथ्वी पर उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य न्याय के लिए प्रसिद्ध हैं; वहीं चलो।
विक्रमादित्य ने संकट समझ लिया — जिस ग्रह को छोटा कहूँगा, वही रुष्ट होगा। उन्होंने नौ धातुओं के नौ सिंहासन बनवाए — सोना, चाँदी, काँसा, ताँबा, सीसा, राँगा, जस्ता, अभ्रक और लोहा — धातु के मोल के क्रम से रखवाए, और कहा — अपने-अपने आसन ग्रहण कीजिए; बैठक ही निर्णय है, पहला आसन सबसे बड़े का।
लोहे का आसन सबसे पीछे था — और उस पर बैठे शनि देव। वे क्रोध में बोले — राजा, तूने मेरा अपमान किया है। तू मेरा बल नहीं जानता: सूर्य एक राशि पर एक महीना रहते हैं, चन्द्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीना, बुध और शुक्र एक-एक महीना, गुरु तेरह महीने — पर मैं ढाई से साढ़े सात वर्ष तक रहता हूँ। राम को मैंने वनवास दिखाया, रावण को मैंने ही मिटाया। अब तू भी देखेगा। विक्रमादित्य ने शांत होकर कहा — जो भाग्य में होगा, देखा जाएगा।
साढ़ेसाती शुरू हुई तो शनि देव घोड़ों के व्यापारी बनकर उज्जयिनी आए। एक से एक बढ़िया घोड़े — राजा ने सबसे अच्छे घोड़े पर पैर रखा ही था कि वह बिजली की तरह भागा, घने जंगल में ले जाकर पटका, और अदृश्य हो गया।
भूखा-प्यासा राजा भटकता रहा। एक चरवाहे ने पानी पिलाया, तो राजा ने अपनी अँगूठी उतारकर दे दी और रास्ता पूछकर एक अनजान नगर पहुँचा। एक सेठ की दुकान पर बैठा तो उस दिन सेठ की बिक्री दूनी-चौगुनी हो गई। सेठ ने भाग्यवान अतिथि जानकर भोजन के लिए घर बुलाया।
उस कमरे में खूँटी पर नौलखा हार टँगा था। राजा के देखते-देखते खूँटी ने हार निगल लिया। सेठ लौटा तो हार ग़ायब — और कमरे में अकेला यही परदेसी। राजा ने सच कहा — खूँटी ने निगला है; पर ऐसी बात कौन माने? रस्सियों से बाँधकर वह नगर के राजा के पास ले जाया गया, और चोरी के दण्ड में उसके हाथ-पैर कटवा दिए गए।
सड़क किनारे पड़े उस अपाहिज को एक तेली उठा लाया और अपने कोल्हू पर बैठा दिया — राजा आवाज़ से बैलों को हाँकता, और बदले में रोटी पाता। इसी तरह दशा के वर्ष बीतते गए — यही वह तेली घर का कोल्हू है, जिसका शनि चालीसा में भी उल्लेख है।
साढ़ेसाती पूरी होने को आई। वर्षा की एक रात राजा कोल्हू पर बैठा मेघ मल्हार गा रहा था। नगर की राजकुमारी मोहिनी ने वह स्वर सुना, दासी भेजकर पता कराया — गाने वाला तेली के घर का एक अपाहिज है। पर राजकुमारी ने प्रण कर लिया — विवाह करूँगी तो इसी से। अन्न-जल त्यागा, तो माता-पिता को झुकना पड़ा, और विवाह हो गया।
विवाह की रात शनि देव स्वप्न में आए — राजा, तूने मेरा प्रकोप देख लिया। राजा ने क्षमा माँगी और एक ही वरदान माँगा — जितना दुख आपने मुझे दिया, उतना अब किसी और को न दें। शनि देव ने स्वीकार किया — जो मेरा पूजन करे, शनिवार का व्रत रखे और यह कथा कहे-सुने, मेरी दशा उसे पीसेगी नहीं; और जो नित्य मेरा स्मरण करके चींटियों को आटा डाले, उसकी मनोकामना पूरी होगी।
सुबह राजा के हाथ-पैर फिर पूरे थे। राजकुमारी चकित रह गई, तब राजा ने अपना परिचय दिया — मैं उज्जयिनी का विक्रमादित्य हूँ। सुनकर सेठ दौड़ा आया और पैरों में गिर पड़ा। राजा ने कहा — यह शनि का प्रकोप था, तुम्हारा दोष नहीं। सेठ के घर भोज हुआ, और सबके सामने उसी खूँटी ने नौलखा हार उगल दिया। सेठ ने अपनी बेटी का विवाह भी राजा से कर दिया।
दोनों रानियों के साथ विक्रमादित्य उज्जयिनी लौटे — नगर में दीप जले, उत्सव हुआ। राजा ने पूरे राज्य में घोषणा कराई — ग्रहों में शनि देव सबसे बड़े हैं; हर स्त्री-पुरुष शनिवार का व्रत रखे और यह कथा सुने। शनि देव प्रसन्न हुए, और व्रत रखने वालों पर उनकी कृपा बनी रही।
कथा कहती है — जो शनिवार का व्रत रखे, शनि देव का पूजन करे और यह कथा कहे-सुने, उस पर शनि की दशा भारी नहीं पड़ती और उसके दुख दूर होते हैं। बोलो शनि देव की जय!
