एक नगर में एक धनी साहूकार रहता था। धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, पर संतान नहीं थी — यही चिंता उसे दिन-रात खाए जाती थी।
पुत्र की कामना से वह हर सोमवार शिव जी का व्रत और पूजन करता, और संध्या को मंदिर में शिव जी के आगे दीपक जलाता। उसकी भक्ति देखकर पार्वती जी का मन भर आया। उन्होंने शिव जी से कहा — स्वामी, यह साहूकार आपका सच्चा भक्त है; इसकी मनोकामना पूरी कीजिए।
शिव जी बोले — पार्वती, यह संसार कर्मक्षेत्र है। जैसा किसान बोता है वैसा काटता है — जो इसके भाग्य में नहीं, वह मैं यों ही कैसे दे दूँ? पर पार्वती जी ने आग्रह किया — अपने भक्त की ही सुध न लेंगे, तो लोग आपकी सेवा क्यों करेंगे?
तब शिव जी ने कहा — अच्छा, इसे पुत्र होगा। पर यह बालक बारह वर्ष ही जिएगा — इससे अधिक इसके लिए मैं कुछ नहीं कर सकता। साहूकार उस समय मंदिर में ही था और यह सारा संवाद उसने अपने कानों से सुन लिया। सुनकर उसे न हर्ष हुआ, न शोक — वह जैसे व्रत करता था, वैसे ही करता रहा।
समय पाकर साहूकार के घर सुंदर पुत्र जन्मा। घर में उत्सव हुआ — पर छोटी आयु का भेद पिता के सिवा कोई नहीं जानता था, और उसने किसी को बताया भी नहीं।
बेटा ग्यारह बरस का हुआ तो माँ ने विवाह की बात चलाई। साहूकार ने कहा — अभी नहीं; पहले यह काशी जाकर विद्या पढ़ेगा। उसने बालक के मामा को बुलाया, खूब धन दिया और कहा — राह में जहाँ-जहाँ ठहरो, यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को भोजन-दक्षिणा देते चलना। मामा-भांजे उसी तरह चल पड़े।
राह के एक नगर में किसी राजा की कन्या का विवाह था। बारात आई थी, पर दूल्हा एक आँख से काना था — उसके पिता को डर था कि कन्या पक्ष देख लेगा तो बारात लौटा देगा। साहूकार के सुंदर बेटे पर उसकी नज़र पड़ी, तो उसने लालच देकर मामा को मना लिया — द्वार की रस्म से लेकर फेरे और कन्यादान तक सब इसी लड़के से करा लिए। विवाह हो गया।
पर सच्चा लड़का झूठ अपने सिर लेकर नहीं गया। चलते समय उसने राजकुमारी की चुनरी पर लिख दिया — तेरा विवाह तो मेरे साथ हुआ है; जिस राजकुमार के साथ तुझे भेजेंगे, वह एक आँख से काना है; मैं काशी पढ़ने जा रहा हूँ। राजकुमारी ने पढ़ा, तो काने दूल्हे के साथ जाने से मना कर दिया — राजा ने बेटी को अपने पास ही रख लिया, और बारात खाली लौट गई।
काशी में पढ़ाई चलती रही, यज्ञ होते रहे। जिस दिन बेटा बारह बरस का हुआ, उस दिन भी यज्ञ हो रहा था। उसने मामा से कहा — आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। मामा ने कहा — भीतर जाकर सो जा। नींद में ही उसके प्राण निकल गए। मामा ने देखा तो कलेजा फट गया — पर पहले उसने यज्ञ पूरा कराया, ब्राह्मणों को भोजन कराया, और तब विलाप शुरू किया — रीत अधूरी नहीं छोड़ी।
संयोग ऐसा कि उसी ओर से शिव-पार्वती जा रहे थे। रोना सुनकर पार्वती जी ठिठक गईं — स्वामी, इसका कष्ट दूर कीजिए। पास आकर शिव जी ने पहचाना — यह तो मेरे ही वरदान का बालक है; इसकी आयु पूरी हुई। पार्वती जी ने फिर आग्रह किया — इसे और आयु दीजिए, नहीं तो इसके माता-पिता तड़प-तड़पकर मर जाएँगे। पार्वती जी के बार-बार कहने पर शिव जी ने जीवन दिया — बालक उठ बैठा।
विद्या पूरी करके मामा-भांजे उसी राह लौटे — यज्ञ कराते हुए उसी नगर पहुँचे। यज्ञ में राजा ने लड़के को पहचान लिया, महल ले जाकर आदर किया, और अपनी बेटी — उसकी ब्याहता — को धन-दासियों के साथ विदा कर दिया।
उधर साहूकार और उसकी पत्नी ने प्रण कर रखा था — बुरी खबर आई तो जीते नहीं बचेंगे; वे छत पर बैठे थे कि उतरेंगे तो आनंद से, नहीं तो वहीं से गिरकर प्राण दे देंगे। मामा ने आगे जाकर पुकारा — बेटा जीता है, बहू और धन के साथ आ रहा है! माता-पिता आनंद से उतरे और बेटे-बहू को गले लगाया।
कथा कहती है — जो सोमवार का व्रत नियम से करे और यह कथा कहे-सुने, शिव-पार्वती की कृपा से उसकी सब मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। बोलो — हर हर महादेव!
