राजा मान्धाता ने वशिष्ठ मुनि से पूछा — हे मुनिवर! कृपा करके कोई ऐसा व्रत बताइए जिससे मेरा कल्याण हो। वशिष्ठ जी बोले — फाल्गुन शुक्ल की आमलकी एकादशी सब व्रतों में उत्तम है — इस दिन भगवान विष्णु के साथ आँवले के वृक्ष का पूजन होता है। इसकी कथा सुनो।
वैदिश नाम का एक नगर था, जहाँ सब लोग मिल-जुलकर आनंद से रहते थे। वहाँ का चंद्रवंशी राजा चैत्ररथ विद्वान और धर्मात्मा था — राज्य में कोई दरिद्र नहीं था, और छोटे-बड़े सब एकादशी का व्रत रखते थे।
फाल्गुन की आमलकी एकादशी आई। राजा और प्रजा सबने व्रत रखा, और मंदिर में पूर्ण-कुंभ स्थापित कर धूप, दीप और नैवेद्य से आँवले के वृक्ष का पूजन किया — हे धात्री! तुम ब्रह्मस्वरूप हो, समस्त पापों का नाश करने वाली हो; मेरा अर्घ्य स्वीकार करो। फिर सबने मंदिर में ही रात्रि जागरण किया।
उसी रात एक शिकारी वहाँ आ निकला — जीव-हिंसा से पेट पालने वाला। भूखा-प्यासा वह एक कोने में बैठ गया, और रात भर विष्णु-कथा और एकादशी का माहात्म्य सुनता रहा। अनजाने में उसका व्रत भी हो गया और जागरण भी।
सुबह सब घर गए, शिकारी भी। समय पाकर उसकी मृत्यु हुई — पर उस एक अनजाने व्रत के पुण्य से उसने राजा विदूरथ के घर जन्म लिया; नाम पड़ा वसुरथ। बड़ा होकर वह दस हज़ार गाँवों का राजा हुआ — तेज में सूर्य सा, कांति में चंद्रमा सी, क्षमा में पृथ्वी सा; धर्मात्मा, सत्यवादी और दानी।
एक दिन राजा वसुरथ शिकार में राह भटक गया और वन में एक पेड़ के नीचे सो गया। पहाड़ी डाकुओं ने उसे अकेला पाकर मारो-मारो कहते हुए घेर लिया — पुरानी दुश्मनी निकालने का मौका जो मिला था।
पर अचरज — डाकुओं के शस्त्र राजा की देह तक पहुँचकर फूल बनकर गिर जाते, और फिर वही शस्त्र उन्हीं पर उलट पड़े। तभी राजा की देह से एक दिव्य स्त्री प्रकट हुई — टेढ़ी भृकुटी, आँखों में अंगार — और क्षणों में उसने सबको काल के गाल में पहुँचा दिया।
राजा जागा तो चारों ओर शत्रुओं के शव पड़े थे। उसने सोचा — यहाँ मेरा ऐसा कौन हितैषी है? तभी आकाशवाणी हुई — हे राजा! इस संसार में भगवान विष्णु के अतिरिक्त तेरी सहायता कौन कर सकता है? राजा लौट आया और सुख से राज करने लगा। वशिष्ठ जी बोले — हे मान्धाता, यह सब उस आमलकी एकादशी का ही बल था।
कथा कहती है — आमलकी एकादशी के व्रत का फल हज़ार गौ-दान के बराबर है; इसे रखने वाले का हर काम सफल होता है और अंत में उसे विष्णुलोक मिलता है। परंपरा इस कथा को ब्रह्मांड पुराण के नाम से कहती है। बोलो भगवान विष्णु की जय!
