महाभारत के दिनों की बात है। व्यास जी ने पांडवों को एकादशी व्रत का संकल्प कराया — हर महीने की दोनों एकादशियों को अन्न नहीं खाया जाता। युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी और माता कुन्ती — सबने नियम उठा लिया। पर भीम खड़े रह गए।
भीम ने हाथ जोड़कर कहा — पितामह, मुझसे भूख सही नहीं जाती। मेरे पेट में वृक नाम की अग्नि है — खाया हुआ तुरंत भस्म हो जाता है और भूख फिर खड़ी हो जाती है। दान कर सकता हूँ, पूजा कर सकता हूँ — पर महीने में दो दिन भूखा रहना मेरे वश का नहीं। क्या मेरे लिए कोई राह नहीं?
व्यास जी मुस्कुराए — राह है, भीम। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी — जब सूर्य वृषभ या मिथुन राशि में होते हैं — तू केवल वही एक व्रत कर। पर उसका नियम कठोर है: सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक न अन्न, न जल — निर्जला। केवल आचमन भर जल की छूट है। कथा स्वयं कहती है — जो यह एक व्रत निभा ले, उसे वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों का फल मिलता है।
भीम काँपे — जल भी नहीं? पर चौबीस के बदले एक — यह सौदा भीम को ही जँचता था। उन्होंने संकल्प लिया, और ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को महाबली भीम ने अन्न-जल त्यागकर व्रत पूरा किया। तभी से यह एकादशी भीमसेनी एकादशी भी कहलाती है — जिसे भूख न सहने वाले भीम ने भी निभाया।
अगले दिन द्वादशी को स्नान करके, ब्राह्मणों को अन्न-जल और दक्षिणा देकर व्रत खोला जाता है। कथा कहती है — इस दिन जल के घड़े का दान बड़ा दान है; जो अपने लिए जल त्यागकर दूसरों को जल पिलाए, उसका व्रत पूरा है।
कथा कहती है — जो निर्जला एकादशी का व्रत रखे और यह कथा कहे-सुने, उसे सब एकादशियों का फल मिलता है और अंत में भगवान विष्णु के धाम की गति होती है। परंपरा इस कथा को पद्म पुराण के माहात्म्य से जोड़ती है। बोलो भगवान विष्णु की जय!
