युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा — भगवन्, आपने हज़ारों यज्ञों से बढ़कर एकादशी व्रत को बताया है। यह तिथि सब तिथियों से उत्तम कैसे हुई? श्रीकृष्ण बोले — यह एकादशी के जन्म की ही कथा है; सुनो।
सतयुग में मुर नाम का महापराक्रमी दैत्य हुआ — नाड़ीजंघ राक्षस का पुत्र, चंद्रावती नगरी उसकी राजधानी। उसने इंद्र, अग्नि, वरुण, यम और वायु — सब देवताओं को जीतकर स्वर्ग से निकाल दिया और उनके आसन आप ले लिए।
देवता शिवजी की शरण गए। शिवजी बोले — तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु के पास जाओ; वही रक्षा करेंगे। क्षीरसागर पहुँचकर देवताओं ने स्तुति की, और इंद्र ने सब कह सुनाया — किस तरह मुर ने सबको निकालकर स्वयं सूर्य तक बनकर प्रकाश करना चाहा।
भगवान विष्णु देवताओं को लेकर चंद्रावती पर चढ़े। मुर की गर्जना सुनते ही देव-सेना भाग खड़ी हुई — भगवान अकेले लड़ते रहे। दैत्य-सेना कटती गई, पर मुर पर अचरज था: भगवान जो भी तीक्ष्ण बाण चलाते, वह उस तक पहुँचकर फूल बनकर गिर जाता।
शस्त्र व्यर्थ हुए तो मल्ल-युद्ध छिड़ा — और चलता रहा दस हज़ार वर्ष। मुर थका नहीं। तब भगवान विश्राम के लिए बद्रिकाश्रम गए और हेमवती नाम की सुंदर गुफा में — जिसका एक ही द्वार था — योगनिद्रा में सो गए।
मुर पीछे-पीछे गुफा तक आ पहुँचा। भगवान को सोता देख वह मारने को शस्त्र उठाए ही था — कि उसी क्षण भगवान की देह से एक तेजस्विनी कन्या प्रकट हुई, दिव्य अस्त्र-शस्त्र धारण किए। उसने मुर को ललकारा, घोर युद्ध किया, और वहीं उसका वध कर दिया।
भगवान जागे तो सामने मुर मरा पड़ा था। पूछा — इस महाबली को किसने मारा? कन्या ने प्रणाम करके कहा — मैंने; मैं आपके ही तेज से उत्पन्न हुई हूँ। प्रसन्न होकर भगवान ने वर माँगने को कहा। देवी बोलीं — जो मेरे दिन व्रत रखे, उसके पाप कटें और उसे मोक्ष मिले।
भगवान ने कहा — ऐसा ही होगा। आपका जन्म एकादशी के दिन हुआ है, अतः आप उत्पन्ना एकादशी के नाम से पूजित होंगी — और आपके भक्त वही होंगे, जो मेरे भक्त हैं। तभी से मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी उत्पन्ना कहलाती है — एकादशी देवी की जन्म-तिथि, जहाँ से व्रत का चक्र आरंभ होता है।
कथा कहती है — भगवान विष्णु को एकादशी व्रत से बढ़कर कुछ प्रिय नहीं; जो इस दिन व्रत रखता है उसके पाप कटते हैं और अंत में वैकुंठ मिलता है। परंपरा इस कथा को भविष्योत्तर पुराण के नाम से कहती है। बोलो भगवान विष्णु की जय!
